Adhikar PUC 2nd year (Sahitya Gaurav) Karnataka Board/Summary/Question & Answer (अधिकार ...सारांश व प्रश्नोंत्तर)
अधिकार
महादेवी वर्मा
कवयित्री परिचय :
जन्म और स्थान: छायावाद की प्रमुख स्तंभ महादेवी वर्मा जी का जन्म सन 1907 में उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में हुआ था।
पारिवारिक प्रभाव: उन पर अपनी माता के आस्तिक विचार और नाना जी के ब्रजभाषा प्रेम का गहरा प्रभाव पड़ा, जिससे बचपन से ही उनका झुकाव साहित्य की ओर हो गया।
शिक्षा: इनकी प्रारंभिक शिक्षा इंदौर में हुई और बाद में उन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. की डिग्री प्राप्त की।
कार्यक्षेत्र: वे प्रयाग महिला विद्यापीठ में प्रधानाचार्या के पद पर कार्यरत रहीं और गद्य व पद्य दोनों विधाओं में निपुणता हासिल की।
प्रमुख सम्मान: उनकी महान साहित्यिक कृति 'यामा' के लिए उन्हें प्रतिष्ठित 'भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार' से नवाजा गया। इसके अतिरिक्त भारत सरकार ने उन्हें 'पद्मभूषण' की उपाधि से भी सम्मानित किया।
साहित्यिक कृतियाँ:
गद्य रचनाएँ: अतीत के चलचित्र, स्मृति की रेखाएँ, पथ के साथी आदि।
काव्य संग्रह: नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्य गीत, दीपशिखा आदि।
काव्यगत विशेषता: महादेवी जी की रचनाओं में बुद्ध दर्शन का प्रभाव और वेदना (पीड़ा) व करुणा का स्वर स्पष्ट रूप से सुनाई देता है। वे संघर्ष को ही जीवन की असल सार्थकता मानती हैं।
निधन: साहित्य की यह महान साधिका 11 सितंबर 1987 को इस संसार से विदा हो गईं।
कविता का सारांश :
वे मुस्काते फ़ूल, नहीं-
जिनको आता है मुरझाना,
वे तारों के दीप, नहीं—
जिनको भाता है बुझ जाना;
वे नीलम से मेघ, नहीं—
जिनको है घुल जाने की चाह,
वह अनन्त ऋतुराज, नहीं—
जिसने देखी जाने की राह!
सारांश :
इस अंश में महादेवी वर्मा जी प्रकृति की अमरता या जड़ता पर प्रहार करती हैं। वे कहती हैं कि उन फूलों में कोई सौंदर्य नहीं जो कभी मुरझाते नहीं, क्योंकि खिलने का आनंद उसके अंत में ही छिपा है। वे उन तारों रूपी दीपकों को भी व्यर्थ मानती हैं जो बुझना नहीं जानते। इसी प्रकार, वे उन नीले बादलों की प्रशंसा करती हैं जो बरसकर खुद को मिटा देने की इच्छा रखते हैं और उस वसंत (ऋतुराज) को अर्थहीन मानती हैं जो कभी विदा नहीं होता। कवयित्री के अनुसार, जिस वस्तु का अंत नहीं होता, उसका कोई वास्तविक मूल्य भी नहीं होता।
कवयित्री मानवीय संवेदनाओं के महत्व को रेखांकित करते हुए कहती हैं कि वे आँखें सूनी और निष्प्राण हैं जिनमें सहानुभूति या विरह के आंसू मोती बनकर नहीं चमकते। वे उस जीवन या शरीर को भी 'सेज' (बिस्तर) की संज्ञा नहीं देतीं जिसमें गहरी पीड़ा या वेदना का निवास न हो। उनके अनुसार, जिस व्यक्ति ने जीवन में दुःख और पीड़ा का अनुभव नहीं किया, उसका जीवन अधूरा और संवेदनाहीन है।
महादेवी जी उस ईश्वरीय लोक या स्वर्ग की आलोचना करती हैं जहाँ दुःख का कोई स्थान नहीं है। वे कहती हैं कि ऐसा लोक किस काम का जहाँ न तो कोई वेदना है और न ही मन को झकझोर देने वाला अवसाद (उदासी)। जहाँ दीपक की तरह जलने का साहस नहीं है और जहाँ किसी को खुद को समर्पित करने या 'मिटने' का सुख मालूम नहीं है, वह स्थान निर्जीव और नीरस है। वे संघर्षपूर्ण जीवन को ही वास्तविक जीवन मानती हैं।
अंत में, कवयित्री ईश्वर से एक निडर तर्क करती हैं। वे पूछती हैं कि क्या मुझे आपकी करुणा के बदले वह अमर लोक मिलेगा जहाँ मृत्यु और दुःख का अस्तित्व ही नहीं है? वे बहुत गर्व के साथ ईश्वर के इस उपहार को अस्वीकार कर देती हैं। वे कहती हैं कि हे देव! मुझे वह स्वर्ग नहीं चाहिए। मुझे मेरा 'मिटने का अधिकार' ही रहने दो। वे अपनी नश्वरता, अपने दुखों और अपनी मृत्यु को सबसे बड़ी संपत्ति मानती हैं क्योंकि यही उन्हें ईश्वर से अलग एक स्वतंत्र पहचान देती है।
यह कविता 'दुःख' को एक उत्सव के रूप में प्रस्तुत करती है।
कवयित्री ने स्वर्ग की अमरता के ऊपर मनुष्य की नश्वरता को श्रेष्ठ बताया है।
छायावादी शैली में लिखी गई यह रचना जीवन के संघर्षों को स्वीकार करने की प्रेरणा देती है।