Ho Gai Peer Parvat Si II PUC Hindi: Summary, Explanation & Important Q&A | हो गई है पीर पर्वत-सी व्याख्या
हो गई है पीर पर्वत-सी (गज़ल)
दुष्यंत कुमार
हिंदी साहित्य में 'जनक्रांति के कवि' कहे जाने वाले दुष्यंत कुमार की यह गज़ल केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि सोए हुए समाज को जगाने वाली एक हुंकार है। कर्नाटक II PUC के पाठ्यक्रम में शामिल यह रचना छात्रों को सामाजिक जिम्मेदारी और बदलाव की प्रेरणा देती है।
कवि परिचय :
दुष्यंत कुमार का जन्म सन 1933 में उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में हुआ था। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. करने के बाद आकाशवाणी और मध्य प्रदेश के भाषा विभाग में अपनी सेवाएँ दीं। यद्यपि उन्होंने कविता, उपन्यास और नाटक जैसी विधाओं में लेखन किया, लेकिन उन्हें सबसे अधिक प्रसिद्धि 'गज़ल' विधा से मिली। उन्होंने उर्दू की इस विधा को नए भारतीय संस्कारों में ढालकर राजनीति और समाज की सटीक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। उनकी मृत्यु सन 1975 में हुई।
प्रमुख रचनाएँ:
काव्य: 'साए में धूप' (गज़ल संग्रह), 'सूर्य का स्वागत', 'आवाजों के घेरे'।
उपन्यास: 'छोटे-छोटे सवाल', 'आँगन में एक वृक्ष'।
काव्य-नाटक: 'एक कंठ विषपायी'।
गज़ल का सरल भावार्थ :
1. "हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए..."
कवि कहते हैं कि आम जनता के दुखों और कष्टों की पीड़ा (पीर) अब हिमालय पर्वत की तरह विशाल और भारी हो गई है। अब समय आ गया है कि यह पीड़ा पिघलनी चाहिए, अर्थात इस दुख का अंत होना चाहिए और इस हिमालय से गंगा जैसी पवित्र क्रांति की धारा निकलनी चाहिए।
2. "आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी..."
समाज में अन्याय और शोषण की जो मजबूत दीवारें खड़ी हैं, वे अब कमजोर पड़कर हिलने लगी हैं। लेकिन कवि की मुख्य शर्त यह थी कि इस भ्रष्ट व्यवस्था की 'बुनियाद' (नींव) हिलनी चाहिए, तभी वास्तविक परिवर्तन आएगा।
3. "हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में..."
बदलाव की यह लहर केवल शहरों तक सीमित न रहे, बल्कि देश के हर कोने—गली, मोहल्ले और गाँव तक पहुँचे। कवि चाहते हैं कि शोषित जनता (जिन्हें कवि ने 'लाश' कहा है) अब चुप न रहे, बल्कि विरोध में हाथ लहराते हुए आगे बढ़े।
4. "सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं..."
कवि स्पष्ट करते हैं कि वे केवल शोर-शराबा या विद्रोह करके प्रसिद्धि नहीं पाना चाहते। उनका एकमात्र उद्देश्य यह है कि समाज की यह बिगड़ी हुई 'सूरत' (अवस्था) बदलनी चाहिए और आम आदमी को उसका हक मिलना चाहिए।
5. "मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही..."
अंत में कवि कहते हैं कि बदलाव की यह 'आग' (जुनून) चाहे मेरे हृदय में जले या तुम्हारे हृदय में, यह मायने नहीं रखता। जरूरी यह है कि समाज को बदलने की यह आग जलती रहनी चाहिए और बुझनी नहीं चाहिए।
प्रश्नोत्तर
I. एक शब्द या वाक्य में उत्तर दीजिए:
1. कवि दुष्यंत कुमार के अनुसार जनता की पीड़ा किसके समान है?
उत्तर: पर्वत के समान।
2. पीर पर्वत हिमालय से क्या निकलनी चाहिए?
उत्तर: गंगा निकलनी चाहिए।
3. दीवार किसकी तरह हिलने लगी?
उत्तर: परदों की तरह।
4. कवि के अनुसार क्या शर्त थी?
उत्तर: शर्त यह थी कि बुनियाद हिलनी चाहिए।
5. पीड़ित व्यक्ति को किस प्रकार चलना चाहिए?
उत्तर: हाथ लहराते हुए चलना चाहिए।
6. कवि का क्या मकसद नहीं है?
उत्तर: सिर्फ हंगामा खड़ा करना।
7. सीने में क्या जलनी चाहिए?
उत्तर: बदलाव की आग जलनी चाहिए।
II. निम्नलिखित प्रश्नों के विस्तृत उत्तर
1. कवि दुष्यंत कुमार के अनुसार समाज में क्या फैला हुआ है?
उत्तर: कवि के अनुसार समाज में चारों ओर दुःख, शोषण और भ्रष्टाचार फैला हुआ है। आम आदमी की समस्याएँ इतनी बढ़ गई हैं कि उन्होंने एक विशाल पर्वत का रूप ले लिया है।
2. 'हो गई है पीर पर्वत-सी' गज़ल से पाठकों को क्या संदेश मिलता है?
उत्तर: यह गज़ल पाठकों को सोई हुई अवस्था से जागने और अन्याय के खिलाफ खड़े होने का संदेश देती है। यह सिखाती है कि केवल शिकायत करने से बदलाव नहीं आता, बल्कि भ्रष्ट व्यवस्था की जड़ों (बुनियाद) को हिलाने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं।
III. ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए (सप्रसंग व्याख्या):
प्रश्न: "सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।"
प्रसंग: यह पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक 'साहित्य गौरव' की गज़ल 'हो गई है पीर पर्वत-सी' से ली गई हैं, जिसके रचयिता दुष्यंत कुमार हैं।
संदर्भ: यहाँ कवि अपने सामाजिक सरोकारों और बदलाव की इच्छा को स्पष्ट कर रहे हैं।
भाव: कवि कहते हैं कि उनका उद्देश्य समाज में केवल विद्रोह का शोर मचाना नहीं है। वे चाहते हैं कि उनके प्रयासों से वर्तमान की दयनीय और भ्रष्ट सामाजिक स्थिति में सुधार आए। वे रचनात्मक और वास्तविक परिवर्तन के पक्षधर हैं।
