Sharan Vachanamrut- Allamprabhu Basaveshwar Akkmahadevi PUC-1st year Sahitya vaibhav Karnataka state board/ Summary/ Question & Answer (शरण वचनामृत सरल भावार्थ )
शरण वचनामृत
१. अल्लमप्रभु (अध्यात्म योगी)
अल्लमप्रभु १२वीं सदी के महान शिवशरणों में सबसे ऊपर माने जाते हैं। उनका जीवन वैराग्य और ज्ञान का अद्भुत संगम है।
पद/स्थान: आप 'अनुभव मंटप' (संसार की पहली आध्यात्मिक संसद) के प्रथम अध्यक्ष थे।
व्यक्तित्व: आपको 'वैराग्य मूर्ति' कहा जाता है। उन्होंने कर्म, भक्ति और ज्ञान के मार्ग का प्रचार किया।
साहित्यिक स्रोत: उनके जीवन के बारे में 'हरिहर' की रचना 'प्रभुदेव रगळे' और चामरस की 'प्रभुलिंग लीले' से जानकारी मिलती है।
मुख्य दर्शन: उन्होंने माया को त्यागकर शून्य (परमात्मा) में विलीन होने का मार्ग दिखाया।
२. महात्मा बसवेश्वर (विश्वज्योति)
महात्मा बसवेश्वर न केवल एक भक्त थे, बल्कि एक महान समाज सुधारक भी थे जिन्होंने समाज में समानता की नींव रखी।
जन्म: इनका जन्म कर्नाटक के बीजापुर जिले के इंगळेश्वर-बागेवाड़ी गाँव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
माता-पिता: पिता का नाम मादरस और माता का नाम मादलांबिका था।
कार्यकाल: इनका जीवनकाल सन् ११३१ से ११६७ तक माना जाता है।
मूल मंत्र (नारा): उन्होंने 'कायक ही कैलास' (Work is Worship) का सिद्धांत दिया, जिसका अर्थ है कि ईमानदारी से किया गया शारीरिक श्रम ही स्वर्ग है।
योगदान: उन्होंने 'अनुभव मंटप' की स्थापना की और जाति-पाति के भेदभाव को जड़ से मिटाकर एक 'विश्वमानव धर्म' का प्रचार किया।
३. अक्कमहादेवी (महान शिवशरणी)
अक्कमहादेवी कन्नड़ साहित्य और 'अनुभव मंटप' की सबसे प्रभावशाली महिला संत थीं।
जन्म: इनका जन्म शिमोगा जिले के उड़तड़ी गाँव में हुआ था।
माता-पिता: इनके पिता का नाम निर्मल शेट्टी और माता का नाम सुमती था।
दीक्षा: इन्होंने उड़तड़ी विरक्तमठ के पट्टाध्यक्ष जी से शिवदीक्षा प्राप्त की थी।
आराध्य देव: अक्कमहादेवी ने श्रीशैल के 'चन्नमल्लिकार्जुन' (शिव) को अपना पति माना और जीवनभर उनकी भक्ति में लीन रहीं।
विशेषता: उन्होंने स्त्री-पुरुष के भेदभाव को मिटाकर अध्यात्म के क्षेत्र में महिलाओं के लिए एक नया मार्ग खोला।
वचनों का सारांश :
१. आद्यात्मयोगी अल्लमप्रभु का वचन
आम तौर पर लोग कनक (सोना), कामिनी (स्त्री) और माटी (ज़मीन) को ही 'माया' मान लेते हैं, लेकिन अल्लमप्रभु जी इस धारणा को पूरी तरह बदल देते हैं। वे बड़ी ही सरल बात कहते हैं कि असली माया बाहर की वस्तुओं में नहीं, बल्कि इंसान के मन के भीतर छिपी 'चाह' या लालच में होती है। जब तक हमारे मन में किसी चीज़ को पाने की तड़प या इच्छा है, तब तक हम माया के जाल में फँसे हुए हैं। वे अपने आराध्य 'गुहेश्वर' को संबोधित करते हुए यह स्पष्ट करते हैं कि बाहरी दुनिया को दोष देने के बजाय अपने मन की इच्छाओं पर काबू पाना ही सच्चा अध्यात्म है।
२. महात्मा बसवेश्वर का वचन
महात्मा बसवेश्वर जी समझाते हैं कि जिस तरह एक छोटा सा दीपक (ज्योति) घने अंधकार को खत्म कर देता है और ज्ञान आने पर अज्ञान का नाश हो जाता है, ठीक उसी तरह सत्य के सामने झूठ कभी नहीं टिक पाता। वे 'पारस पत्थर' का बहुत सुंदर उदाहरण देते हैं, जिसके स्पर्श मात्र से लोहा सोना बन जाता है। बसवेश्वर जी कहते हैं कि उनके जीवन में भी ऐसा ही चमत्कार हुआ है—शिवशरणों (संतों) के अनुभवों और उनकी संगति ने उनके जीवन को पूरी तरह बदल दिया है और उन्हें इस सांसारिक मोह-माया (भव) के बंधनों से आज़ाद कर दिया है। वे अपने आराध्य 'कूडलसंगम देवा' के प्रति पूरी तरह समर्पित दिखाई देते हैं।
३. शिवशरणी अक्कमहादेवी का वचन
अक्कमहादेवी जी ने इस वचन में जीवन जीने का एक बहुत ही व्यावहारिक और साहसी नजरिया पेश किया है। वे कहती हैं कि यदि आपने पर्वत पर अपना घर बनाया है, तो आप वहाँ के जंगली जानवरों से डरकर नहीं रह सकते। ठीक इसी तरह अगर घर समुद्र के किनारे है तो लहरों के शोर से और यदि बाजार (हाट) के बीच है तो वहाँ की हलचल से घबराना बेकार है। वे संदेश देती हैं कि चूंकि हमने इस संसार (जगत) में जन्म लिया है, तो यहाँ लोगों द्वारा की जाने वाली तारीफ (स्तुति) या बुराई (निंदा) से डरना छोड़ देना चाहिए। अपने आराध्य 'चन्नमल्लिकार्जुन' की भक्ति करते हुए वे सीख देती हैं कि इंसान को हर हाल में अपने मन को शांत और संतुलित (समचित्त) रखना चाहिए।
प्रश्नोंत्तर :
(आपकी बोर्ड परीक्षा की तैयारी के लिए 'शरण वचनामृत' पाठ के अभ्यास प्रश्नों के सबसे सटीक और आसान उत्तर यहाँ दिए गए हैं। इन्हें इस तरह लिखा गया है कि आप इन्हें पढ़ते ही याद कर सकें और परीक्षा में पूरे अंक ला सकें।)
I. एक शब्द या वाक्यांश या वाक्य में उत्तर लिखिए:
१. कनक, कामिनी और माटी को लोगों ने क्या कहा है?
उत्तर: लोगों ने इन्हें माया कहा है।
२. अल्लमप्रभु देव के आराध्य देव कौन थे?
उत्तर: उनके आराध्य देव गुहेश्वर थे।
३. बसवेश्वर के अनुसार ज्ञान से क्या दूर होता है?
उत्तर: ज्ञान से अज्ञान दूर होता है।
४. ज्योति से क्या दूर होता है?
उत्तर: ज्योति से तमंध (अंधकार) दूर होता है।
५. बसवेश्वर के आराध्य देव का नाम क्या है?
उत्तर: उनके आराध्य देव का नाम कूडलसंगम देवा है।
६. सत्य से क्या दूर होता है?
उत्तर: सत्य से असत्य दूर होता है।
७. पारस से क्या दूर होता है?
उत्तर: पारस पत्थर के स्पर्श से लोहे का लोहत्व (लोहापन) दूर होकर वह सोना बन जाता है।
८. पर्वत पर बसा कर घर किससे नहीं डरना चाहिए?
उत्तर: पर्वत पर घर बनाकर जंगली जानवरों से नहीं डरना चाहिए।
९. हाट (बाजार) में बसा कर घर किससे नहीं डरना चाहिए?
उत्तर: बाजार में घर बनाकर वहाँ के शोरगुल से नहीं डरना चाहिए।
१०. जगत में जन्म लेने के बाद किससे नहीं डरना चाहिए?
उत्तर: जगत में जन्म लेने के बाद लोगों की स्तुति (तारीफ) और निंदा (बुराई) से नहीं डरना चाहिए।
II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए :
१. अल्लमप्रभु देव ने माया के सम्बन्ध में क्या कहा है?
उत्तर: अल्लमप्रभु जी कहते हैं कि दुनिया जिसे माया समझती है (जैसे सोना, स्त्री या जमीन), वह असल में माया नहीं है। उनके अनुसार, असली माया इंसान के मन के भीतर की 'चाह' या लालच है। जब तक हमारे मन में किसी चीज को पाने की इच्छा बनी रहती है, तब तक हम माया के जाल में फँसे रहते हैं।
२. बसवेश्वर के विचारों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: महात्मा बसवेश्वर जी का मानना है कि जैसे प्रकाश अंधेरे को और सत्य झूठ को मिटा देता है, वैसे ही ज्ञान अज्ञान को खत्म कर देता है। वे कहते हैं कि जिस तरह पारस पत्थर लोहे को सोना बना देता है, उसी तरह शिवशरणों (संतों) की संगति और उनके अनुभव इंसान के जीवन को बदल देते हैं। संतों के साथ से ही व्यक्ति सांसारिक मोह-माया के बंधनों से मुक्त हो सकता है।
३. अक्कमहादेवी के अनुसार भवसागर में कैसे रहना चाहिए?
उत्तर: अक्कमहादेवी जी के अनुसार, यदि हमने इस संसार में जन्म लिया है, तो हमें मुश्किलों से घबराना नहीं चाहिए। वे कहती हैं कि जैसे समुद्र के किनारे रहकर लहरों से नहीं डरा जाता, वैसे ही दुनिया में रहकर लोगों की निंदा या तारीफ की चिंता नहीं करनी चाहिए। इंसान को अपने मन से क्रोध निकालकर हमेशा 'समचित्त' (शांत और संतुलित) रहना चाहिए और निडर होकर भक्ति करनी चाहिए।
III. ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए।
ज्ञान से अज्ञान दूर होता है,
ज्योति से तमंध दूर होता है,
सत्य से असत्य दूर होता है,
पारस से लोहत्व दूर होता है,
आपके शरणों के अनुभाव से
मेरा भव छूट गया, कूडलसंगम देवा।
संदर्भ: यह पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक 'साहित्य वैभव' के 'शरण वचनामृत' पाठ से ली गई हैं, जिसके रचनाकार महात्मा बसवेश्वर हैं।
भाव: इन पंक्तियों में बसवेश्वर जी संगति और ज्ञान का महत्व बता रहे हैं। वे कहते हैं कि जैसे ज्योति से अंधेरा और पारस से लोहा बदल जाता है, वैसे ही जब उन्हें शिवशरणों (संतों) का साथ और अनुभव मिला, तो उनका अज्ञान मिट गया। संतों के सान्निध्य में आने से उनका 'भव' (सांसारिक जन्म-मरण का बंधन) छूट गया और उन्हें सच्ची शांति मिल गई।
शरण वचनामृत पर परीक्षा में पूछे जानेवाले प्रश्नों को ध्यान में रखकर आसान भाषा में किया गया `Full expalanation Video ‘ देखने के लिए नीची दी गई लिंक पर क्लिक करें।
Sharanvachanamrut Part- 1 Full Explanation
Sharan Vachanamrut Part 2 Full Explanation