Raskhan Ke Savaiye PUC-1st year Sahitya vaibhav Karnataka state board/ Summary/ Question & Answer (रसखान के सवैये सरल भावार्थ )
रसखान के सवैये
कवि परिचय:
* जन्म और नाम:
* इनका जन्म सन् १५४८ के करीब दिल्ली के एक संपन्न पठान परिवार में हुआ था। इनका असली नाम 'सैयद इब्राहिम' था।
* मुस्लिम धर्म में पैदा होने के बावजूद, भगवान कृष्ण के प्रति इनकी दीवानगी ऐसी थी कि इन्होंने अपना पूरा जीवन ब्रज में ही बिता दिया।
* इन्होंने गोस्वामी विट्ठलनाथ जी से भक्ति की शिक्षा ली और 'वल्लभ संप्रदाय' के अनुयायी बन गए।
* प्रमुख रचनाएँ:
'सुजान-रसखान' और 'प्रेमवाटिका'
* मृत्यु:
सन् १६२८ में इनकी जीवन-लीला समाप्त हुई, लेकिन उनकी कविताएँ आज भी अमर हैं।
कविता का सारांश :
मानुष हों, तो वही रसखानि बसौ ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हों, तो कहा बसु मेरो, चरौ नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हौं, तो वही गिरि कौ, जो धरयौ कर छत्र पुरन्दर धारन।
जो खग हौं, बसेरो करौं मिलि कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन॥
भावार्थ : कविता के पहले हिस्से में रसखान ने अपनी एक बहुत ही सुंदर इच्छा व्यक्त की है। वे कहते हैं कि अगर उनका अगला जन्म हो, तो वे किसी भी रूप में हों, बस ब्रज की भूमि पर ही रहें। अगर वे इंसान बनें तो गोकुल के ग्वालों के साथ रहना चाहते हैं। अगर वे जानवर (पशु) बनें तो उनका मन है कि वे नंद बाबा की गायों के बीच चरें। यहाँ तक कि अगर वे पत्थर भी बनें, तो उसी गोवर्धन पर्वत का हिस्सा बनना चाहते हैं जिसे कृष्ण ने अपनी उंगली पर उठाया था। अंत में वे कहते हैं कि अगर मैं पक्षी बनूँ, तो यमुना किनारे कदम्ब के पेड़ों पर मेरा ठिकाना हो। इसका मतलब यह है कि रसखान हर हाल में अपने आराध्य कृष्ण के पास रहना चाहते हैं।
२.
कविता के दूसरे भाग में कवि ने बहुत ही मानवीय एहसास दिखाया है। गोपी कहती है कि वह कृष्ण का रूप तो धर लेगी, लेकिन वह उस बाँसुरी (मुरली) को कभी अपने होठों से नहीं लगाएगी। इसका कारण यह है कि उसे मुरली से चिढ़ है। उसे लगता है कि यह मुरली ही है जो कृष्ण के होठों पर हमेशा सजी रहती है और इसकी वजह से कृष्ण गोपियों को समय नहीं दे पाते। वह मुरली को अपनी 'सौत' की तरह मानती है। यह बात दिखाती है कि प्रेम में जहाँ समर्पण है, वहीं थोड़ा-सा अधिकार और जलन भी जुड़ी होती है।
I. एक शब्द या वाक्यांश या वाक्य में उत्तर लिखिए:
१) रसखान मनुष्य रूप में अगला जन्म कहाँ लेना चाहते हैं?
उत्तर: रसखान मनुष्य के रूप में गोकुल गाँव के ग्वालों के बीच जन्म लेना चाहते हैं।
२) रसखान पशु रूप में जन्म लेने पर कहाँ रहना चाहते हैं?
उत्तर: पशु रूप में जन्म लेने पर वे नंद बाबा की गायों के बीच चरना चाहते हैं।
३) रसखान पक्षी रूप में जन्म लेने पर किस डाली पर बसना चाहते हैं?
उत्तर: पक्षी के रूप में वे यमुना किनारे स्थित कदम्ब के पेड़ की डालियों पर बसेरा करना चाहते हैं।
४) गोपी सिर पर क्या धारण करना चाहती है?
उत्तर: गोपी अपने सिर पर मोरपंखों से बना मुकुट धारण करना चाहती है।
५) गोपी कृष्ण की मुरली कहाँ नहीं रखना चाहती?
उत्तर: गोपी कृष्ण की मुरली को अपने होठों (अधरों) पर नहीं रखना चाहती।
II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए:
१) रसखान ब्रजभूमि में क्यों जन्म लेना चाहते हैं?
उत्तर: रसखान कृष्ण के अनन्य भक्त हैं और उनके प्रति अपनी गहरी श्रद्धा के कारण वे ब्रजभूमि से भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं। उनका मानना है कि ब्रज के कण-कण में भगवान कृष्ण का वास है। वे चाहते हैं कि चाहे वे इंसान बनें, पशु, पक्षी या पत्थर, हर हाल में वे ब्रज में ही रहें ताकि उन्हें कृष्ण की लीला-भूमि का सान्निध्य मिलता रहे। उनके लिए स्वर्ग के सुखों से बढ़कर कृष्ण की जन्मभूमि में रहना है।
२) गोपी क्या-क्या स्वांग भरती है?
उत्तर: कृष्ण के वियोग में व्याकुल गोपी उनका रूप धारण कर अपने मन को तसल्ली देना चाहती है। इसके लिए वह अपने सिर पर मोरपंखों का मुकुट लगाती है और गले में गुंज की माला पहनती है। वह कृष्ण की तरह पीले वस्त्र (पितम्बर) ओढ़कर और हाथ में लाठी लेकर ग्वालों के साथ गायों के पीछे वन-वन भटकने का स्वांग भी रचती है। वह वह सब कुछ करने को तैयार है जो कृष्ण को प्रिय था।
३) गोपियों का कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम कैसा है?
उत्तर: गोपियों का प्रेम निस्वार्थ और अटूट है। वे कृष्ण के रंग में इस कदर रंगी हुई हैं कि उनके जैसा दिखने के लिए कोई भी रूप धरने को तैयार हैं। हालांकि, उनके प्रेम में एक तरह का अधिकार भाव और 'सौतिया डाह' (जलन) भी है। वे कृष्ण की मुरली को अपनी दुश्मन मानती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि मुरली बजाते समय कृष्ण उन्हें भूल जाते हैं। इसीलिए वे कृष्ण का सारा वेश तो अपनाती हैं, लेकिन उनकी मुरली को हाथ तक नहीं लगाना चाहतीं।
III. ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए:
"मानुष हों, तो वही रसखानि बसौ ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
जो पसु हों, तो कहा बसु मेरो, चरौ नित नंद की धेनु मँझारन॥
पाहन हौं, तो वही गिरि कौ, जो धरयौ कर छत्र पुरन्दर धारन।
जो खग हौं, बसेरो करौं मिलि कालिन्दी-कूल-कदम्ब की डारन॥"
संदर्भ: ये पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक 'साहित्य वैभव' के 'रसखान के सवैये' नामक पाठ से ली गई हैं। इसके रचयिता प्रसिद्ध कृष्ण भक्त कवि रसखान हैं।
भावार्थ: इन पंक्तियों में रसखान ने कृष्ण और उनकी जन्मभूमि ब्रज के प्रति अपना गहरा लगाव जाहिर किया है। कवि ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि यदि उनका जन्म फिर से मनुष्य के रूप में हो, तो वे गोकुल के ग्वालों के साथी बनें। यदि वे पशु बनें, तो उन्हें नंद की गायों के साथ चरने का मौका मिले। यदि वे पत्थर बनें, तो उसी गोवर्धन पर्वत का हिस्सा बनें जिसे कृष्ण ने छत्र की तरह उठाकर इंद्र का घमंड तोड़ा था। और यदि वे पक्षी बनें, तो यमुना (कालिन्दी) के तट पर स्थित कदम्ब के पेड़ों की डालियों पर उनका बसेरा हो।