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Kutiya me Rajbhavan PUC-1st Year/Summary/Qustion & Answer /Karnataka State Board (कुटिया में राजभवन ..भावार्थ/Solutions)

                                                                 कुटिया में राजभवन

                                                                                    मैथिलीशरण गुप्त

कवि परिचय :

* मैथिलीशरण गुप्त जी का जन्म 1886 ई. में उत्तरप्रदेश के चिरगाँव में हुआ।

* आपको राष्ट्रकवि के नाम से जाना जाता है।

* आपकी रचनाएँ राष्ट्रप्रेम और जनजागरण का कार्य करती हैं।

* आपकी मृत्यु 1964 ई. में हुई।

प्रमुख रचनाएँ : 

* साकेत

* जयद्रथ वध

* पंचवटी

* झँकार

* यशोधरा

* द्वापर

* विष्णु-प्रिया

* भारत-भारती

भावार्थ :

यह कविता ‘साकेत’ इस महाकाव्य से ली गई है। जिसमें रामचरित्र का वर्णन किया है। राम अपनी पत्नी सीता व भाई लक्ष्मण के साथ चौदह वर्ष के लिए वनवास जाते हैं। सीता वन में राजभवन जैसा सुख भोगती है। इसका सुंदर वर्णन इस कविता में किया गया है। 

माता सीता को वन में अपनी कुटिया में रहते हुए राजभवन जैसा अनुभव व आनंद प्राप्त हो रहा है। उनका मन इस कुटिया में अब लग गया है। उनके प्राणेश अर्थात राम इस कुटिया रुपी राजभवन में उनके सम्राट हैं और सचिव लक्ष्मण हैं। उन्हें ऋषि-मुनि आकर आशीर्वाद देते हैं। वे बताती हैं कि यहाँ धन का कोई मूल्य नहीं है। इस वनकी असंख्य संपत्ति या खज़ाना के आगे धन एकदम तुच्छ है। इस वन में सभी प्राणी मिल-जुलकर रहते हैं। कोई भी जानवर एक-दूसरे का दुश्मन नहीं है। एक ही किनारे पर मृग (हिरण) और सिंह पानी पीते हैं।   
 
माता सीता कुटिया में जैसे-जैसे दिन बिताने लगी, उन्हें कुटिया में राजभवन-सा आनंद प्राप्त होने लगा। उन्हें कुटिया में रहकर अधिक लाभ प्राप्त होने लगा था। वे बताती हैं कि जब वह महल में रहती थी तो दूसरों पर अधिक निर्भर रहती थीं। उनका हर एक काम करने के लिए सेविका उपस्थित रहती थीं। लेकिन यहाँ वह अपने पैरों पर खड़ी हैं मतलब वे दूसरों पर निर्भर नहीं हैं। वे अपने सारे काम स्वयं ही करती हैं। उन्हें परिश्रम करके बहे हुए पसीने की एक-एक बूँद से शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त हो रहा है। मतलब परिश्रम करने से स्वास्थ्य भी अच्छा हो रहा है और मन में अच्छे विचार आने से जीवन में सकारात्मक विचार भी निर्माण हो रहे हैं। मैं गर्मी से जब बेहाल या बेचैन होती हूँ  तब अपने हाथों से पंखा करते हुए शीतलता का अनुभव प्राप्त करती हूँ।  

शरीर पेड़ की शाखा के समान झुकने पर ही सफ़लता का स्वाद चखने को मिलता है। अर्थात कठिन परिश्रम करने पर ही सफ़लता मिलती है। यह सफ़लता प्राप्त होने पर वास्तविकता में कुटिया राजभवन के समान लगने लगती है। वन में हवा के झोंकों के साथ कोमल हाथों की तरह हिलती पेड़-पौधों की नई-  पत्तियाँ मानो इनका स्वागत कर रही हैं। मन में कोमल भाव जैसे उमटते हैं ठीक वैसे ही ये फ़ूल कोमल भावों की तरह खिले हैं। डालियों पर नियमित नए-नए फ़ल मिलते हैं। ओस की बूँदें घास पर गिरती हैं और  सूरज की किरणें पड़ने से वे बूँदें मोतियों की तरह चमकती हैं। सीता को वन की इस प्राकृतिक सुंदरता के सामने महल में खाने के लिए रखे फ़ल, पंखा करती सेविका, स्वागत के लिए खड़े लोग तथा महल की शोभा बढ़ाने वाले झुमर खोकले लगते हैं।

सीता कहती हैं कि प्रकृति अपनी जादू या माया से अपना खज़ाना खोलकर दिखा रही है, जो राज्य-वैभव के धन से भी मूल्यवान है। मुझे यह कुटिया राजभवन के समान मन को भा गयी है। कौन कहता है कि मेरे नसीब या भाग्य ने मुझे धोखा दिया है? बल्कि यहाँ आकर तो मेरे अंदर जो भय रहता था वह भी दूर हो गया है। मैं निर्भय होकर वन में जीवन बिता रही हूँ। मैं अब हर एक काम स्वयं अपने हाथों से कर रही हूँ। पहले तो मैं हर एक काम में दूसरों पर निर्भर रहती थी। लेकिन वन में ही मेरा गृहस्थ जीवन जाग उठा है।

सीता या जानकी अयोध्या की वधू बनकर महल की रानी बनी थीं। लेकिन अब वह अपने पति के साथ वन में जीवन बिता रही हैं। महल में रहने वाली सीता को आज कुटिया का जीवन राजभवन के समान लग रहा है। पेड़ की फ़ल-फ़ूलों से लदी या भरी ड़ालियाँ ही उसकी संपत्ति है। हरे-हरे पत्तलों में परोसा खाना उसके लिए खाने की थालियों के समान लग लग रहा है। मुनि या ऋषियों की बालायें (कन्याएँ) उसकी सखियाँ बन गई हैं और नदी पर उठने वाली लहरों की आवाज़ ही उसके लिए तालियाँ बन गई हैं।

सीता के लिए खेल का सामान उसकी स्वयं की छाया ही बन गई है। उसकी छाया के अलावा उसके पास खेलने के लिए कोई भौतिक साधन नहीं है। ऐसे आनंद से कुटिया में दिन काटती सीता को यह कुटिया राजभवन के समान लग रही है। उसे महल और राजभवन से भी अधिक आनंद प्रकृति के संपर्क में रहकर जीवन जीने में प्राप्त हो रहा है।

Kutiya me Rajbhavan / PUC-1st Year/ Karnataka/ Full Marks

I.  एक शब्द या वाक्यांश या वाक्य में उत्तर लिखिए।

१. सीता जी का मन कहाँ भाया?

उत्तर : सीता जी का मन कुटिया में भाया।

२. सीता जी के प्राणेश कौन थे?

उत्तर : सीता जी के प्राणेश उनके पति राम थे।

३. सीता जी कुटिया को क्या समझती हैं?

उत्तर : सीता जी कुटिया को राजभवन समझती हैं।

४. नवीन फ़ल नित्य कहाँ मिला करते हैं?

उत्तर : नवीन फ़ल नित्य पेड़ की ड़ालियों पर मिला करते हैं।

५. सीता की गृहस्थी कहाँ जगी?

उत्तर : सीता जी की गृहस्थी वन में जगी।

६. वधू बनकर कौन आयी हैं?

उत्तर : वधू बनकर जानकी / सीता  आयी हैं।

७. सीता की सखियाँ कौन हैं?

उत्तर : सीता की सखियाँ मुनि बालायें या कन्याएँ हैं।

II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए:

१. सीता जी अपनी कुटिया में कैसे परिश्रम करती थीं?

उत्तर : सीता जी कुटिया में परिश्रम करते हुए स्वावलंबी बन गई हैं। राजभवन में हर एक काम में दूसरों पर निर्भर रहने वाली अब दूसरों के हाथों से नहीं पल रही हैं। अपने पैरों पर खड़ी होकर चलती हैं। रथ या डोली की अब उसे सहायता नहीं चाहिए। परिश्रम करके बहते पसीने से स्वास्थ्य रुपी फ़ल प्राप्त कर रही है। परिश्रम करते समय होनेवाली गर्मी से ठंड़क प्राप्त करने के लिए अपने ही अंचल या पल्लू से स्वयं पंखा करती हैं। श्रम और आत्मनिर्भरता से जीवन निर्वाह करने पर ही सुख की अनुभूति होती है।

२. सीता जी प्रकृति -सौंदर्य के बारे में क्या कहती हैं?

उत्तर : सीता जी प्रकृति-सौंदर्य का वर्णन करते हुए कहती हैं कि प्रकृति ने अपना सारा खज़ाना सीता जी के लिए खोलकर रखा है या दिखा रही है। हवा के कारण हिलते हुए पेड़ तथा पौधों के नए-नए पत्ते कोमल हाथों की तरह हर तरफ़ आते-जाते समय उनका स्वागत कर रहे हैं। वन में खिले सुंदर फ़ूल मन में उत्पन्न कोमल भावना की तरह खिले हुए हैं। हर दिन डालियों पर नए और ताज़े-ताज़े फ़ल खाने का आनंद वन के पेड़-पौधे दे रहे हैं। घास पर ओस की बूँदें मोतियों की तरह चमक रही हैं। 

३. सीता जी कुटिया में कैसे सुखी हैं?

उत्तर : सीता जी कुटिया में राजभवन के समान आनंद प्राप्त कर रही हैं। राजभवन से वनवास के लिए आते समय वह चिंतित थीं क्योंकि महल की रानी सीता जी सभी सुख-सुविधाओं में रहती थीं। लेकिन कुटिया में रहकर उन्हें सभी काम करने पड़ रहे थे। थोड़े दिनों के अंतराल में वे सभी काम स्वयं करने लगीं और उन्हें वहाँ सुख प्राप्र होने लगा। वे सभी काम आनंद से कर रही हैं क्योंकि इससे उनका स्वास्थ्य अच्छा हो रहा है। गृहिणी बनकर गृहस्थी के सारे काम स्वयं करने से इनका वन में आने पर गृहस्थ जीवन जगा है। राजभवन में दूसरों पर निर्भर रहने वाली सीता जी कुटिया में अपना हर काम करके अच्छी पत्नी और गृहिणी बनी है। इन सब बातों से कुटिया में वे सुखी हैं। 

४. ‘कुटिया मे राजभवन’ कविता का आशय संक्षेप में लिखिए।

उत्तर : कवि ने इस कविता में सीता जी ने अपने पति राजा राम और लक्ष्मण के साथ १४ सालों तक वनवास जाकर बितायें दिनों का वर्णन किया है। राजभवन की रानी सीता जी कुटिया में रहकर आनंद से गृहिणी धर्म का पालन करती हैं। राजभवन की सुख-सुविधाओं में रहने वाली सीता जी स्वावलंबी बनकर सफ़ल जीवन जी रही हैं। कठिन परिश्रम से शारीरिक स्वास्थ्य और सफ़लता प्राप्त की जा सकती हैं। यहाँ धन तथा राजवैभव का कोई मूल्य नहीं है। भौतिक साधनों के पीछे न लगकर प्राकृतिक सुंदरता में अधिक आनंद से जीवन प्राप्त किया जा सकता है। जैसे हिरण और सिंह दुश्मनी भावना को त्यागकर एक ही किनारे पर पानी पी रहे हैं, वैसे ही किसी भी प्रकार का स्वार्थ और मतभेद न हो और सभी मिल-जुलकर रहते हो। 

III.ससंदर्भ भाव स्पष्ट कीजिए:

१.  औरों के हाथों यहाँ नहीं पलती हूँ,

     अपने पैरों पर खड़ी आप चलती हूँ,

     श्रमवारि-बिन्दु फ़ल स्वास्थ्य-शुक्ति फ़लती हूँ

     अपने हाथों से व्यजन आप झलती हूँ।

प्रसंग : यह पद्यांश कक्षा ११ वीं के ‘साहित्य वैभव’ पाठ्यपुस्तक के मैथिलीशरण गुप्त जी की ‘कुटिया में राजभवन’ इस कविता से लिया गया है।

संदर्भ : प्रस्तुत कविता में सीता जी की आत्मनिर्भरता का वर्णन किया है।

स्पष्टिकरण : सीता जी वनवास के समय कुटिया में राजभवन के समान आनंद प्राप्त कर रही हैं। राजभवन में सीता जी अनेक सुख-सुविधाओं में रहती थीं। लेकिन अब वे स्वयं अपने सारे काम कर रही हैं। अपने पैरों पर खड़ी है मतलब आत्मनिर्भर बन गई हैं। परिश्रम से पसीना बहा रही हैं जिससे स्वास्थ्य रुपी फ़ल प्राप्त हो रहा है। गर्मी से बेचैन होने पर वे अपने अंचल या पल्लू से स्वयं पंखा करके गर्मी से ठंडक प्राप्त कर रही हैं। सीता जी इस प्रकार का जीवन जीने को अधिक महत्व दे रही हैं।

 २.  कहता है कौन कि भाग्य ठगा है मेरा?

      वह सुना हुआ भय दूर भगा है मेरा।

      कुछ करने में अब हाथ लगा है मेरा,

      वन में ही तो गार्हस्थ्य जगा है मेरा।

प्रसंग : यह पद्यांश कक्षा ११ वीं के ‘साहित्य वैभव’ पाठ्यपुस्तक के मैथिलीशरण गुप्त जी की ‘कुटिया में राजभवन’ इस कविता से लिया गया है।

संदर्भ : प्रस्तुत कविता में सीता जी कुटिया में रहकर गॄहस्थी जगने पर स्वयं को भाग्यशाली मान रही हैं।

स्पष्टिकरण : सीता जी कुटिया में राजभवन के समान आनंद प्राप्त कर रही हैं। वे स्वयं को भाग्यशाली मान रही है कि उन्हें वन में जीवन जीने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वे कहती हैं कि अगर कोई यह कहता है कि वन में रहकर मुझे नसीब ने धोखा दिया है, तो यह बात झूठ है। बल्कि वन में रहकर मेरे मन में जो भय था वह दूर हो गया है। अब मुझे काम करने में आनंद मिलता है। यहाँ आकर मैं स्वावलंबी बन गई हूँ। मेरा गृहस्थ जीवन यहीं आकर जागृत हो गया है। इसलिए मैं आपने आपको सौभाग्यशाली मानती हूँ।


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Kutiya me Rajbhavan / PUC-1st Year/ Karnataka/ Full Marks











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