Ganga Maiya Se Sakshatkar/PUC 2nd year (Sahitya Gaurav) Karnataka Board/Summary/Question & Answer (गंगा मैया से साक्षात्कार ...सारांश व प्रश्नोंत्तर)
गंगा मैया से साक्षात्कार
डॉ. बरसाने लाल चतुर्वेदी
लेखक परिचय :
* बरसाने लाल चतुर्वेदी का जन्म 15 अगस्त 1920 को मथुरा, उत्तरप्रदेश में हुआ।
* हास्य-रस कवि के रुप में विख्यात थे।
* हास्य-रस पर पीएच.डी. और ‘आधुनिक काव्य में व्यंग्य’ पर डी.लिट. की उपाधि प्राप्त की।
* इनका साहित्य हँसाता भी है और विसंगतियों के प्रति जागरुक भी करता है।
प्रमुख रचनाएँ :
* भोलाराम पंडित की बैठक
* मिस्टर चोखेलाल
* बुरे फ़ँसे
* मिस्टर खोए-खोए
* हास्य निबंध संग्रह
पाठ का सारांश :
गंगा मैया से साक्षात्कार यह पाठ ‘मुसीबत है’ नामक संग्रह से लिया गया है। इस पाठ के माध्यम से समाज में फ़ैले भ्रष्टाचार, महँगाई, और धर्म की आड़ में हो रहे गलत आचरण पर व्यंग्य किया है। यह पाठ भले ही काल्पनिक है लेकिन इसमें समाज में फ़ैली कुरीतियों की वास्तविकता पर प्रकाश डाला है।
लेखक मकर संक्राति के दिन इलाहाबाद में था और गंगा मैया से साक्षात्कार लेने के लिए उनके सचिव से दो महीने पहले ही समय ले चुका था। साक्षात्कार के वक्त गंगा मैया मंदिर में विराजमान हो रही थीं लेकिन उनके चेहरे पर उदासी का भाव था। लेखक माँ के चरण छुकर वही पास में पड़ी मृगछाला पर बैठकर प्रश्न पूछ्ता है कि “माँ आप भी प्रदूषित हो रही हैं?” इस प्रश्न के उत्तर में माँ लेखक को कहती हैं कि “अब देश का संपूर्ण वातावरण ही प्रदूषित हो गया है तब मैं इससे कैसे बच सकती हूँ? गंगामैया इसके साथ ‘चरित्र का संकट’ इस विषय पर पूछे गए प्रश्न पर भी उत्तर देते हुए कहती हैं कि चरित्र का संकट भी पहले उनका ही अंग था। लेकिन अब वह अतीत की वस्तु हो गया है। आज वह अपने आपको सिर्फ़ शब्दकोशों में देख पा रहा है। मास्टर लोग कभी-कभी कक्षाओं में पढ़ाते समय इस शब्द का प्रयोग कर रहे हैं। सेवा करने से चरित्र बनता था लेकिन अब ‘सेवाहि परोमोधर्म’ की जगह ‘मेवाहि परमोधर्म’ कहने से चरित्र का अस्तित्व मिट गया है। अनेक व्यापारी लोग मुझमें स्नान करते हुए मेरे नारे लगाते हैं और बाद में फ़िर से गलत काम करते हैं। उन्हें लगता है कि कैसे भी कर्म करके मुझमें स्नान करने से उनको मैं तार दूँगी। ये सभी व्यापारी लोग जनता को कष्ट देकर मेरी शरण में आते हैं और मुझे भी मलीन करते हैं।
साक्षात्कार में गंगामैया आगे बताती हैं कि देश में महँगाई, रिश्वतखोरी और पाशविकता इतनी बढ़ती जा रही है कि इसका कोई अंत दिखाई नहीं देता। धर्म का व्यापारीकरण हो गया है। राजनेता तो कुर्सी के लिए एक-दूसरे से झगड़ने का काम कर रहे हैं क्योंकि कुर्सी से धन, वैभव, सम्मान, कीर्ति और शक्ति प्राप्त होती है। मनुष्य अपना स्वार्थ पूरा करने के लिए इतना गिर गया है कि पशु-पक्षी भी इनपर हँसने लगे हैं। समाज जातियों बँटा है जिससे हरिजनों पर अत्याचार हो रहे हैं। सबको मैंने समान रुप से खिलाया लेकिन ये लोग अपने ही भाई-बहनों को मौत के घाट उतार रहे हैं। ऐसे लोग मेरे कैसे भक्त हो सकते हैं। अत: मैं इनसे कैसे प्रदूषित होने से बच सकती हूँ।
लेखक अंत में गंगामैया से इन समस्याओं को लेकर भविष्य में निर्माण होनेवाली स्थिति पर पूछते हैं तो वे कहती हैं कि प्रकृति सर्वशक्तिमान है। पतन की जब पराकाष्ठा होती है तब पुन: उत्थान की किरणे फ़ूटती हैं। साक्षात्कार के अंत में लेखक पूछे गए प्रश्नों के उत्तर गंगामैया ने स्नेहभाव से दिए इसलिए उन्हें धन्यवाद देते हैं।
I. एक शब्द या वाक्यांश या वाक्य में उत्तर लिखिए:
1. लेखक ने किनसे साक्षात्कार लिया है?
उतर : लेखक ने गंगामैया से साक्षात्कार लिया है।
2. लेखक मकर-संक्रांति के दिन कहाँ थे?
उत्तर : लेखक मकर-संक्रांति के दिन इलाहाबद में थे।
3. माँ कहाँ विराज रही थी?
उत्तर: माँ मंदिर में विराज रही थी।
4. माँ के चेहरे पर क्या थी?
उत्तर : माँ के चेहरे पर उदासी थी।
5. किसका संकट चर्चा का विषय बना हुआ है?
उत्तर: चरित्र का संकट चर्चा का विषय बना हुआ है।
6. गंगा मैया ने सत्य को क्या कहा है?
उत्तर: गंगा मैया ने सत्य को निर्भय कहा है।
7. किसका व्यापारीकरण हो रहा है?
उत्तर : धर्म का व्यापारीकरण हो रहा है।
8. असली झगड़ा किसके बारे में है?
उत्तर : असली झगड़ा कुर्सी के बारे में है।
9. मनुष्य के कुकर्मों पर कौन हँसने लगे हैं?
उत्तर : पशु-पक्षी भी मनुष्य के कुकर्मों पर हँसने लगे हैं।
10. गंगा मैया ने किसे सर्व शक्तिमान कहा है?
उत्तर : गंगा मैया ने प्रकृति को सर्वशक्तिमान कहा है।
11. पुन: उत्थान की किरणें कब फ़ूटती हैं?
उत्तर : पतन की पराकाष्ठा होने पर उत्थान की किरणें पुन: फ़ूटती हैं।
II. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर लिखिए।
1. प्रदूषण के बारे में गंगा मैया ने क्या कहा है?
उत्तर : प्रदूषण के बारे में गंगा मैया ने कहा कि मनुष्य ने धरती पर गंदगी फ़ैलाकर इतना प्रदूषण किया है कि नदियाँ भी या स्वयं वह भी इससे नहीं बची। सबके पापों की मैल धोने वाली मैं भी प्रदूषित हुई हूँ।